जब डायबिटीज़ बन जाती है पेट के लिए मुसीबत तो होती है ये बीमारी

 

Picture credit : herbanplanet.com

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डायबिटीज़ एक ऐसी बीमारी है जो शरीर के सभी अंगों को प्रभावित करती है। इनमें से एक है वेगस नर्व जोकि पेट कितने समय में खाली होता है, इस बात को नियंत्रित करता है। अगर ये क्षतिग्रस्‍त हो जाए तो पाचन धीमा पड़ जाता है और खाना लंबे समय तक शरीर में ही रहता है।

इस अवस्‍था को गैस्‍ट्रोपेरेसिस कहते हैं। इसमें कमजोरी और उल्‍टी करने का मन करता है। ये ब्‍लड शुगर लेवल के लिए भर खराब होता है। ये समस्‍या टाइप 1 डायबिटीज़ के रोगियों में ज्‍यादा देखने को मिलती है और टाइप 2 डायबिटीज़ के मरीज़ भी इससे ग्रस्‍त रहते हैं।

जिन लोगों को 10 साल से भी ज्‍यादा समय से मधुमेह हो या जिनमें इस बीमारी से संबंधित कोई समस्‍या हो तो उनमें गैस्‍ट्रोपेरेसिस का खतरा रहता है।

लक्षण

  • सीने में जलन
  • जी मितली
  • उल्‍टी होना
  • ब्‍लड शुगर कंट्रोल करने में दिक्‍कत आना
  • खाना खाते समय पेट जल्‍दी भर जाना
  • उदर में सूजन
  • पाचन कमजोर और वजन में कमी आना

मुश्किल

  • पेट में लंबे समय तक खाना रहने पर वो खराब होने लगता है और बैक्‍टीरिया पैदा करता है।
  • खाना ना पचने पर सख्‍त हो जाता है और गांठ बना देता है। ये पेट को ब्‍लॉक कर सकता है और छोटी आंत में खाना फंस सकता है।
  • गैस्‍ट्रोपेरेसिस में डायबिटीज़ को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है। जब खाना पेट को छोड़ता और छोटी आंत में जाता है जो ब्‍लड शुगर बढ़ जाता है।

क्‍या है ईलाज

डॉक्‍टर आपसे लक्षणों के बारे में पूछेगा। साथ ही वो आपका शारीरिक चैकअप भी करेंगें और ब्‍लड शुगर भी चैक कर सकते हैं। इसके अलावा वो आपके ये टेस्‍ट भी करवा सकते हैं :

बेरियम एक्‍स-रे

बेरियम लिक्‍विड पिलाया जाता है जो कि एसोफेस, पेट और छोटी आंत में जाता है और एक्‍स-रे में नज़र आता है। इस टेस्‍ट को अप्‍पर जी आई सीरीज़ या बेरियम स्‍वैलो भी कहते हैं।

बेरिअम बीफस्‍टीक मील

इसमें बेरियम के साथ खाना खिलाया जाता है और डॉक्‍टर एक्‍सरे से देखते हैं कि खाने को पचने में कितना समय लग रहा है। इससे डॉक्‍टर को पता चलता है कि पेट कितनी जल्‍दी खाली हो रहा है।

Picture credit : herbal-care-products.com

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रेडियोआइसोटोप गैस्ट्रिक एंप्टिंग स्‍कैन

आपको ऐसा खाना खिलाया जाता है जिसमें रेडियो एक्टिव तत्‍व हो। इसके बाद स्‍कैनर में मरीज़ को इसकी रेडिएशन देखने के लिए लिटा दिया जाता है। अगर स्‍कैनर में आधे से ज्‍यादा खानेा 1.5 घंटे के बाद भी पेट में रहता है तो आपको गैस्‍ट्रोपेरेसिस है।

गैस्ट्रिक मैनोमेट्री

डॉक्‍टर मुंह और पेट में एक पतली सी ट्यूब डालते हैं जोकि ये मापती है कि खाना कितनी जल्‍दी पच रहा है।

वायरलैस मोटिलिटी कैप्‍सूल

इस छोटे से डिवाइस को भोजन के साथ निगला जाता है। ये पेट के विभिन्‍न भागों में प्रेशर, तापमान और पीएच को मापता है।

इलेक्‍ट्रोगैस्‍ट्रोग्राफी

टेस्‍ट के दौरान मरीज़ को त्‍वचा पर इलेक्‍ट्रोड्स पहनाया जाता है जोकि पेट में इलेक्ट्रिक एक्टिविटी को मापता है।

अल्‍ट्रासाउंड

पेट के अंदर क्‍या चल रहा है ये जानने के लिए डॉक्‍टर साउंड वेव्‍स का इस्‍तेमाल करते हैं।

अप्‍पर एंडोस्‍कोपी

गले से एक पतली ट्यूब अंदर डाली जाती है जोकि पेट की लाइनिंग को देखती है।

पेट और छोटी आंत की बायोसप्‍सी

इस बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्‍टर को टिश्‍यू के छोटे से सैंपल की जरूरत पड़ती है।

ट्रीटमेंट

गैस्‍ट्रोपेरेसिस और इसके लक्षणों को नियंत्रित करने के अलावा इसका और कोई ईलाज नहीं है। ब्‍लड शुगर को कंट्रोल करने से मदद मिलती है। अपने डॉक्‍टर से पूछें कि क्‍या आपको इंसुलिन लेने का समय और तरीका बदल देना चाहिए और कितनी बार शुगर लेवल चैक करना चाहिए।

इसके अलावा डॉक्‍टर से ये भी पूछें कि आपको गैस्‍ट्रोपेरेसिस को और ज्‍यादा खराब होने से बचाने के लिए दवाएं कब बदलनी या बंद कर देनी चाहिए। इसमें एंटीडिप्रेसेंट, हाई ब्‍लड प्रेशर की दवाएं और कुछ मधुमेह की दवाएं शामिल हैं।

गैस्‍ट्रोपेरेसिस के कुछ मरीज़ों को दवाओं से भी आराम मिलता है।

डाइट में बदलाव

डायबिटीज़ की बीमारी में गैस्‍ट्रोपेरेसिस के लक्षणों को कंट्रोल करने का सबसे बेहतरीन तरीका है कि आप कब और कैसे खाएं। दिन में तीन बार खाने की बजाय आपको अपने खाने को 6 छोटी मील्‍स में बांट देना चाहिए। पेट में कम खाना होने से आपको पेट भरा हुआ महसूस नहीं होगा। इससे खाना आसानी से आपके तंत्र से निकल जाएगा।

इसके अलावा खाने के टेक्‍सचर पर भी ध्‍यान दें। आसानी से पचने वाली और तरल चीज़ें खाएं। जैसे कि साबुत सेब की जगह सेब की चटनी खा सकते हैं।

ऐसी चीज़ों को खाने से बचें जिनमें फैट बहुत ज्‍यादा होता है जोकि पाचन को धीमा कर देती हैं। फाइबर युक्‍त चीज़ें खाएं जोकि पचने में समय लगाती हैं।

इतना रखें ब्‍लड शुगर लेवल

  • खाना खाने से पहले : टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज़ के मरीज़ों में 4 से 7 एमएमओएल
  • खाना खाने के बाद : टाइप 1 डायबिटीज़ में 9 एमएमओएल से कम और टाइप 2 डायबिटीज़ के मरीज़ों में 8.5 एमएमओएल
  • ब्‍लड शुगर लेवल से डायबिटीज़ का पता लग सकता है

ब्‍लड शुगर नॉर्मल रखने के टिप्‍स

  • नियमित व्‍यायाम से वजन को कम और इंसुलिन की संवेदनशीलता को बढ़ाया जा सकता है। इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ने से कोशिकाएं बेहतर तरीके से रक्‍त वाहिकाओं में शुगर का स्‍त्राव कर पाती हैं। व्‍यायाम से मांसपेशियां ऊर्जा में ब्‍लड शुगर का इस्‍तेमाल कर पाती हैं। वेट लिफ्टिंग, ब्रिस्‍क वॉकिंग, दौड़ना, बाइकिंग, डांसिंग, हाइकिंग और तैराकी आदि कर सकते हैं।
  • शरीर कार्बोहाइड्रेट को शुगर में बदल देता है और फिर इंसुलिन शुगर को कोशिकाओं में भेजता है। अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट का सेवन करने से इंसुलिन के कार्य में बाधा आ सकती है और इससे ब्‍लड ग्‍लूकोज़ का स्‍तर बढ़ सकता है। अपने खाने में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा का ध्‍यान रखें। लो कार्ब डाइट से ब्‍लड शुगर के स्‍तर को कम रखा जा सकता है।
  • पर्याप्‍त पानी पीने से हर बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है। पर्याप्‍त मात्रा में पानी पीने से ब्‍लड शुगर का स्‍तर सामान्‍य रहता है। अधिक मात्रा में पानी पीने से किडनी से यूरिन के रास्‍ते अधिक ब्‍लड शुगर शरीर से बाहर निकल जाता है। रोज़ पानी पीने से रक्‍त री-हाइड्रेट रहता है और ब्‍लड शुगर का स्‍तर कम हो जाता है जिससे डायबिटीज़ का खतरा नहीं रहता।

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