भारत में पूर्वजों की वजह से तेजी से फैल रही है मधुमेह की बीमारी

Picture credit : Times of India

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विकसित देशों में रहने वाले स्‍वस्‍थ पूर्वजों की तुलना में भारत जैसे विकासशील देशों में मध्‍यम आय वर्ग के लोगों में डायबिटीज़ की बीमारी ज्‍यादा पाई जाती है। हाल ही में एक भारतीय प्रोफेसर द्वारा करवाए गए एक अध्‍ययन में ये बात सामने आई है।

इस रिसर्च के परिणाम जर्नल सेल मेटाबॉलिज्‍म में प्रकाशित हो चुके हैं। इस रिसर्च में पाया गया कि अगर आपके पूर्वज कई पीढियों तक पोषणयुक्‍त आहार नहीं लेते हैं तो आप नॉर्मल डाइट से भी मोटापे का शिकार हो सकते हैं। पश्चिमी देशों की तुलना में मध्‍यम वर्ग के विकासशील देशों में इस वजह से टाइप 2 डायबिटीज़, ओबेसिटी और कार्डियोवस्‍कुलर रोगों का खतरा ज्‍यादा तेजी से बढ़ रहा है।

इस रिसर्च की मानें तो विकासशील देशों में साल 2030 तक 70 प्रतिशत जनसंख्‍या टाइप 2 डाय‍बिटीज़ की बीमारी से ग्रस्‍त होगी। वहीं विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के अनुसार साल 2030 तक भारत में 80 मिलियन लोग डायबिटीज़ से ग्रस्‍त होंगें।

इसमे कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है कि विकासशील देशों में शांति तो बढ़ी है लेकिन इसके साथ ही वहां के लोग कैलोरी का सेवन भी ज्‍यादा करने लगे हैं। हालांकि, पर्यावरण में बदलाव के कारण भी लोगों के जींस में बदलाव आया है जिसका डाइट में बदलाव से कोई लेना-देना नहीं है। इसका मतलब है कि अब भी उनका शरीर कुछ इस तरह से डिजाइन हुआ है उनमें पोषण की कमी है और उनमें फैट कुछ इस तरह से जमा होता है जो उन्‍हें ओबेसिटी और अन्‍य कई तरह की बीमारियों का शिकार बना रहा है। नॉर्मल डाइट लेने पर भी लोग इन बीमारियों से बच नहीं पा रहे हैं।

इस स्‍टडी में चूहों को शामिल किया गया और उन्‍हें दो समूहों में बांटा गया। इनमें से एक ग्रुप 50 सालों से पोषण की कमी से ग्रस्‍त था और इन्‍हें दो पीढियों तक नॉर्मल डाइट दी गई। दूसरे ग्रुप को 52 पीढियों तक नॉर्मल डाइट दी गई। पहले ग्रुप को नॉर्मल डाइट देने के बाद भी उनमें पोषण की कमी पाई गई। इन चूहों में डायबिटीज़ का खतरा आठ गुना ज्‍यादा था और इनमें मेटाबॉलिक विकार भी थे।

इन्‍हें 2 पीढियों तक नॉर्मल डाइट देने के बाद भी इनके मेटाबॉलिक विकार को ठीक नहीं किया जा सकता था। ऐसे लोगों में अतिरिक्‍त पोषण फैट के रूप में जमा हो जाता है और ओबेसिटी, कार्डियोवस्‍कुलर रोग और मेटाबॉलिक विकार को जन्‍म देता है।

वहीं इन चहूों में विटामिन बी12 की कमी के कारण भी डायबिटीज़ का खतरा पाया गया। बी12 के कम और हाई फोलेट लेवल के कारण इंसुलिन रेसिस्‍टेंस और टाइप 2 डायबिटीज़ का खतरा बढ़ जाता है।

डायबिटीज़ से बचने के तरीके :

Picture credit : The Health site

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बॉडी फैट घटाएं

ओवरवेट होने पर मधुमेह का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। वहीं प्रत्‍येक किलो वजन घटाने से मधुमेह का खतरा भी 16 प्रतिशत तक कम हो जाता है। स्‍वस्‍थ जीवनशैली और डाइट के ज़रिए वजन आसानी से घटाया जा सकता है। छोटी-छोटी बातों का ध्‍यान रखकर आप लंबे समय तक स्‍वस्‍थ रह सकते हैं।

कॉम्‍प्‍लेक्‍स कार्ब वाला संतुलित आहार

कई तरह के फल-सब्जियां खाएं, प्रोटीन लें और फैट के बेहतर स्रोतों का सेवन करें। जिन फूड्स में ट्रांस फैट यानि की हाइड्रोजेनरेटेड फैट, प्रोसेस्‍ड फूड और शुगर ज्‍यादा होता है उनसे दूर रहें। कॉम्‍प्‍लेक्‍स कार्बोहाइड्रेट्स में फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है। इन्‍हें पचने में थोड़ा समय लगता है और इस वजह से ये लंबे समय तक ऊर्जा का बेहतर स्रोत बन सकते हैं।

खुद को रखें हाइड्रेट

ओबेसिटी और डायबिटीज़ से संबंधित अध्‍ययनों में शुगरयुक्‍त बेवरेज़ेज़ के संबंध के बारे में बताया गया है। इन्‍हें अपनी डाइट से हटाकर आप कई तरह की बीमारियों से बच सकते हैं। रोज़ाना कम से कम 7-8 गिलास पानी जरूर पीएं। खूब सारे फल खाएं और शरीर को डिहाइड्रेट रखने के लिए हर्बल टी पीएं।

व्‍यायाम है जरूरी

ना के बराबर शारीरिक क्रिया करने वाले लोगों में सबसे ज्‍यादा मधुमेह का खतरा रहता है। एक्‍सरसाइज़ से कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति ज्‍यादा संवेदनशील हो जाती है। इसके लिए आप ब्रिस्‍क वॉक कर सकते हैं। 35-40 मिनट तक रोज़ हल्‍के व्‍यायाम से भी फायदा हो सकता है।

तनाव करें कम

आज शायद ही ऐसा कोई व्‍यक्‍ति होगा जिसे कोई तनाव या परेशानी ना हो। तनाव की वजह से कई तरह के हार्मोन रिलीज़ होते हैं जिससे ब्‍लड शुगर का स्‍तर बढ़ जाता है। कई अध्‍ययनों में भी ये बात साबित हुई है कि मेडिटेशन करने से तनाव को कम किया जा सकता है। शारीरिक व्‍यायाम और सोशल सपोर्ट से तनाव को कम किया जा सकता है।

बेहतर नींद

अनिद्रा या बेहतर नींद ना ले पाने की स्थिति में डायबिटीज़ और ओबेसिटी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। सोने के लिए एक तय वक्‍त रखें और पर्याप्‍त नींद लें। रोज़ाना 7 से 8 घंटे की नींद बहुत जरूरी होती है। पर्याप्‍त नींद ना लेने से ना केवल इसका असर शरीर पर पड़ता है बल्कि इससे आपका काम और जीवन भी प्रभावित होने लगता है।

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